कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥
भावार्थ : जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोक संग्रह को देखते हुए भ
मनोबुद्ध्यहंकारचित्ता नि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥
मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृतिनहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आ