Santosh Chaturvedi

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥ भावार्थ : जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोक संग्रह को देखते हुए भ

(480 days ago)

  • अर्थात्:शंकरजी पार्वतीजी से कहते हैं- कमलानने! अब मैं अष्टोत्तरशत (१०८) नाम का वर्णन करता हूँ, सुनो; जिसके प्रसाद (पाठ या श्रवण) मात्र से&nb...
  • श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्ईश्र्वर उवाचशतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने।यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।आर्या दुर्गा&nb...
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    • Santosh Chaturvedi 478 days ago

      अर्थात्:

      शंकरजी पार्वतीजी से कहते हैं- कमलानने! अब मैं अष्टोत्तरशत (१०८) नाम का वर्णन करता हूँ, सुनो; जिसके प्रसाद (पाठ या श्रवण) मात्र से परम साध्वी भगवती दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं
       
      सती, साध्वी, भवप्रीता (भगवान् शिव पर प्रीति रखनेवाली), भवानी, भवमोचनी (संसार बन्धन से मुक्त करनेवाली), आर्या, दुर्गा, जया, आद्या, त्रिनेत्रा, शूलधारिणी, पिनाकधारिणी, चित्रा, चण्डघण्टा(प्रचण्ड स्वर से घण्टानाद करनेवाली), महातपा: (भारी तपस्या करनेवाली), मन: (मनन-शक्ति ), बुद्धि: (बोधशक्ति ), अहंकारा (अहंताका आश्रय), चित्तरूपा, चिता, चिति: (चेतना), सर्वमन्त्रमयी, सत्ता (सत्-स्वरूपा), सत्यानन्दस्वरूपिणी, अनन्ता (जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं), भाविनी (सबको उत्पन्न करनेवाली), भाव्या (भावना एवं ध्यान करने योग्य), भव्या (कल्याणरूपा), अभव्या (जिससे बढकर भव्य कहीं है नहीं), सदागति,शाम्भवी (शिवप्रिया), देवमाता, चिन्ता, रत्‍‌नप्रिया, सर्वविद्या, दक्षकन्या, दक्षयज्ञविनाशिनी, अपर्णा (तपस्या के समय पत्ते को भी न खानेवाली), अनेकवर्णा (अनेक रंगोंवाली), पाटला (लाल रंगवाली), पाटलावती (गुलाब के फूल या लाल फूल धारण करनेवाली), पट्टाम्बरपरीधाना (रेशमी वस्त्र पहननेवाली), कलमञ्जररञ्जिनी (मधुर ध्वनि करनेवाले मञ्जीर को धारण करके प्रसन्न रहनेवाली), अमेयविक्रमा(असीम पराक्रमवाली), क्रूरा (दैत्यों के प्रति कठोर), सुन्दरी, सुरसुन्दरी, वनदुर्गा, मातङ्गी, मतङ्गमुनिपूजिता, ब्राह्मी, माहेश्वरी, ऐन्द्री, कौमारी, वैष्णवी, चामुण्डा, वाराही, लक्ष्मी:, पुरुषाकृति:, विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बुद्धिदा, बहुला, बहुलप्रेमा, सर्ववाहनवाहना, सर्वासुरविनाशा, सर्वदानवघातिनी, सर्वशास्त्रमयी, सत्या, सर्वास्त्रधारिणी, अनेकशस्त्रहस्ता, अनेकास्त्रधारिणी, कुमारी, एककन्या, कैशोरी, युवती, यति, अप्रौढा, प्रौढा, वृद्धमाता, बलप्रदा, महोदरी, मुक्त केशी, घोररूपा, महाबला, अग्निज्वाला, रौद्रमुखी, कालरात्रि:, तपस्विनी, नारायणी, भद्रकाली, विष्णुमाया, जलोदरी, शिवदूती, करली, अनन्ता (विनाशरहिता), परमेश्वरी, कात्यायनी, सावित्री, प्रत्यक्षा, ब्रह्मवादिनी

      देवी पार्वती! जो प्रतिदिन दुर्गाजी के इस अष्टोत्तरशतनाम का पाठ करता है, उसके लिये तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं है

      वह धन, धान्य, पुत्र, स्त्री, घोडा, हाथी, धर्म आदि चार पुरुषार्थ तथा अन्त में सनातन मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है

      कुमारी का पूजन और देवी सुरेश्वरी का ध्यान करके पराभक्ति के साथ उनका पूजन करे, फिर अष्टोत्तरशत नाम का पाठ आरम्भ करे

      देवि! जो ऐसा करता है, उसे सब श्रेष्ठ देवताओंसे भी सिद्धि प्राप्त होती है। राजा उसके दास हो जाते हैं। वह राज्यलक्ष्मी को प्राप्त कर लेता है

      गोरोचन, लाक्षा, कुंकुम, सिन्दूर, कपूर, घी (अथवा दूध), चीनी और मधु- इन वस्तुओं को एकत्र करके इनसे विधि पूर्वक यन्त्र लिखकर जो विधिज्ञ पुरुष सदा उस यन्त्र को धारण करता है, वह शिव के तुल्य (मोक्षरूप) हो जाता है

      भौमवती अमावास्या की आधी रात में, जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र पर हों, उस समय इस स्तोत्र को लिखकर जो इसका पाठ करता है, वह सम्पत्तिशाली होता है

      ।।प्रेम से बोलो जय माँता दी।।

  • Santosh Chaturvedi posted to the micro post 480 days ago
    कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥ भावार्थ : जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोक संग्रह को देखते हुए भ
  • Santosh Chaturvedi posted to the micro post 480 days ago
    मनोबुद्ध्यहंकारचित्ता नि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे। न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥ मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृतिनहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आ
  • जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो । दैत्य संहारन वेद उधारन दुष्टन को तुमहीँ खलती हो। खड्ग त्रिशूल लिये धनुबान औ सिंह चढ़े रण मेँ लड़ती हो॥ दास के साथ सहाय सदा सो दया करि आन फते करती हो। मोहिँ पुकारत देर भई जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो॥१॥ आदि की ज्योति...
  • Santosh Chaturvedi posted to the micro post 483 days ago
    "ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नम:"॥
  • Santosh Chaturvedi has a new avatar 484 days ago
    Santosh Chaturvedi
  • *महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र*अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुतेगिरिवर-विन्ध्य-शिरोधि-निवासिनि विष्णुविलासिनि-जिष्णुनुते।भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृतेजय जय ...